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फ्लैट कल्चर व प्रदूषण से तीस फीसदी लोग एलर्जी के शिकार

- एलर्जी डायग्रोसिस एंड इम्यूनो थेरेपी वर्कशॉप आयोजित

  04-Sep-2018
जयपुर। शहरी संस्कृति और मल्टी स्टोरी फ्लैट कल्चर के चलते आज आबादी के 20 से 30 प्रतिशत लोग एलर्जी के शिकार हो रहे हैं। वजह है, महानगरीय आरामतलब रहन-सहन और बढ़ता प्रदूषण। एलर्जी का सबसे बढ़ा कारक डस्ट माइट है। एलर्जी मरीजों की इतनी बड़ी संख्या के बावजूद इस बीमारी से घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि अत्याधुनिक जांच सुविधा और नई इम्यूनो थेरेपी के जरिए इसका उपचार आसान हो गया है। देश के प्रमुख एलर्जी रोग विशेषज्ञों ने रविवार को यहां आयोजित एलर्जी डायग्रोसिस एंड इम्यूनो थेरेपी वर्कशॉप में इस बीमारी से संबंधित ऐसी ही जानकारी दी और नई उपचार पद्धतियों के बारे में बताया। आंच हॉस्पिटल की ओर से आयोजित इस वर्कशॉप में 150 से ज्यादा एक्सपट्र्स ने भाग लिया। कार्यक्रम के आयोजन सचिव डॉ. एमके गुप्ता ने बताया कि इस दौरान विभिन्न सत्रों में एलर्जी कैसे और क्यों होती है, इसकी जांच और उपचार, स्किन एलर्जी, फूड एलर्जी, ड्रग एलर्जी आदि के कारण और बचाव, नई जांच तकनीक तथा इम्यूनो थेरेपी से इलाज आदि के बारे में विशेषज्ञों ने चर्चा की। आयोजन समिति की डॉ. पल्लवी पेरीवाल ने आयोजन की जानकारी दी। वर्कशॉप में बेंगलुरू एलर्जी सेंटर के प्रमुख डॉ. नागेंद्र प्रसाद ने बताया कि आज एलर्जी बहुत बड़ी बीमारी होती जा रही है। 15 साल से कम उम्र के करीब 20 प्रतिशत बच्चे एलर्जी से ग्रसित हैं और उन्हें बार-बार जुकाम, गला खराब होना, पसलियां चलना आदि परेशानी घेरे रहती है। इसके पीछे बड़ा कारण ज्यादातर बच्चों का घर की चारदीवारी में ही कैद रहना है। ऐसे में एसी और भारी कर्टेन, सोफा, कालीन आदि के हर समय संपर्क में रहने से डस्ट माइट इन्हें एलर्जी का शिकार बना देता है। बहुमंजिला फ्लैट कल्चर के चलते मकानों में सूर्य की रोशनी नहीं आ पाती है और डस्ट माइट पनपने का मौका मिल जाता है। डॉ. प्रसाद ने क्लीनिकल एप्रोच इन एलर्जी डायग्रोसिस पर भी विस्तार से जानकारी दी।
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